पाठ्यक्रम: जीएस-2/ शासन
चर्चा में क्यों?
- कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा आयोजित ‘चलो संसद’ विरोध प्रदर्शन के दौरान मध्य दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया।
इंटरनेट शटडाउन क्या है?
- इसे “इंटरनेट या इलेक्ट्रॉनिक संचार का जानबूझकर किया गया व्यवधान, जिससे किसी विशिष्ट जनसंख्या या किसी स्थान पर इंटरनेट सेवाएँ पूरी तरह से अथवा प्रभावी रूप से अनुपयोगी हो जाएँ, प्रायः सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करने के उद्देश्य से” परिभाषित किया जाता है।
इंटरनेट बंदी कई रूपों में हो सकती है, जैसे—
- संपूर्ण नेटवर्क सेवाओं को बंद करना,
- इंटरनेट की गति को धीमा करना (throttling),
- अथवा विभिन्न डिजिटल मंचों (प्लेटफ़ॉर्मों) को अवरुद्ध करना।
कारण
- इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स के अनुसार, अधिकांश इंटरनेट बंदी तब लागू की जाती है जब बड़ी संख्या में लोगों के राजनीतिक कारणों, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों, हिंसक विरोध-प्रदर्शनों अथवा धार्मिक आयोजनों के लिए एकत्र होने की संभावना होती है।
- कुछ इंटरनेट बंदी किसी संभावित घटना की आशंका में निवारक उपाय के रूप में लागू की जाती हैं, जबकि अन्य का उद्देश्य पहले से चल रही घटनाओं को नियंत्रित करना होता है।
भारत में इंटरनेट शटडाउन की स्थिति
- SFLC इंटरनेट शटडाउन ट्रैकर के अनुसार, 2012 से अब तक जम्मू एवं कश्मीर में देश में सर्वाधिक, लगभग 449 इंटरनेट शटडाउन दर्ज की गई हैं। इसके बाद राजस्थान (115) तथा मणिपुर (62) का स्थान है।
- 2026 में भारत में अब तक लगभग 24 इंटरनेट शटडाउन दर्ज की गई हैं।
- भारत में अब भी विश्व के सर्वाधिक इंटरनेट शटडाउन वाले देशों में से एक होने की स्थिति बनी हुई है।
- एक्सेस नाउ (Access Now) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 65 इंटरनेट बंदी दर्ज की गईं।
- यद्यपि यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में कम थी, फिर भी एक संवैधानिक लोकतंत्र के लिए इसका स्तर असाधारण माना जाता है।
इंटरनेट शटडाउन के पक्ष में तर्क
- लोक व्यवस्था बनाए रखना: सांप्रदायिक तनाव या नागरिक अशांति के दौरान सामाजिक माध्यमों पर घृणा भाषण, अफवाहों तथा भड़काऊ सामग्री के तीव्र प्रसार को रोकने में सहायता मिलती है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा: संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में शत्रुतापूर्ण या आतंकवादी समूहों के बीच संचार एवं समन्वय को बाधित करती है।
- प्रशासनिक विफलता से बचाव: प्रतियोगी परीक्षाओं में संगठित नकल तथा बड़े पैमाने पर प्रश्नपत्र लीक को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर इंटरनेट सेवाएँ अस्थायी रूप से निलंबित की जाती हैं।
इंटरनेट शटडाउन के विरुद्ध तर्क
- अधिकारों पर प्रतिबंध: इंटरनेट बंदी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सूचना तक पहुँच, शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार तथा व्यापार और व्यवसाय करने की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों को सीमित करती है।
- आर्थिक हानि: इसका डिजिटल अर्थव्यवस्था, ई-कॉमर्स, यूपीआई लेन-देन, गिग श्रमिकों तथा इंटरनेट पर निर्भर दैनिक वेतनभोगी श्रमिकों की आजीविका पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- नागरिक स्वतंत्रताओं का उल्लंघन: इससे नागरिकों की स्वास्थ्य सेवाओं, ऑनलाइन शिक्षा, आपातकालीन सेवाओं तथा महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक सूचनाओं तक पहुँच बाधित होती है।
- आधिकारिक संचार माध्यमों के बंद होने से ऐसा शून्य उत्पन्न हो जाता है, जिसे प्रायः ऑफलाइन माध्यमों से फैलने वाली खतरनाक अफवाहें भर देती हैं।
भारत में इंटरनेट शटडाउन को नियंत्रित करने वाला कानून
- पहले भारत में इंटरनेट शटडाउन भारतीय तार अधिनियम, 1885 की धारा 5(2) तथा दूरसंचार सेवाओं का अस्थायी निलंबन (लोक आपातकाल या लोक सुरक्षा) नियम, 2017 के अंतर्गत नियंत्रित की जाती थी।
- अब इन्हें दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 20 तथा दूरसंचार (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024 द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है।
- दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 20(2)(b) के अनुसार, सरकार केवल लोक आपातकाल या लोक सुरक्षा के हित में इंटरनेट अथवा दूरसंचार सेवाओं को निलंबित कर सकती है, केवल इसलिए नहीं कि कोई विरोध-प्रदर्शन चल रहा है।
- ऐसा निलंबन निर्धारित वैधानिक आधारों पर, लिखित कारणों सहित, दूरसंचार (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024 के अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया जाएगा तथा पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए प्रभावित क्षेत्र, अवधि, तिथि और समय का विवरण सार्वजनिक किया जाएगा।
- प्राधिकारी यह भी परीक्षण करेंगे कि क्या वही उद्देश्य किसी कम प्रतिबंधात्मक उपाय से प्राप्त किया जा सकता है।
क्या आप जानते हैं?
- इंटरनेट शटडाउन के आदेशों को अब अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय अथवा उपयुक्त मामलों में अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
- न्यायालय यह परीक्षण करते हैं कि आदेश वैध, आवश्यक, आनुपातिक तथा क्षेत्र और अवधि की दृष्टि से सीमित है या नहीं।
- सरकार को आदेश जारी करते समय उसके कारण दर्ज करने होंगे, कम प्रतिबंधात्मक विकल्पों पर विचार करना होगा तथा दूरसंचार (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024 का पालन करना होगा, जिसके अनुसार इंटरनेट शटडाउन का आदेश 15 दिनों से अधिक अवधि के लिए वैध नहीं हो सकता। अनिश्चितकाल के लिए इंटरनेट सेवाएँ बंद करना असंवैधानिक है।
क्रियान्वयन संबंधी समस्याएँ
- कई राज्यों ने निरस्त किए जा चुके भारतीय तार अधिनियम, 1885 तथा 2017 के नियमों के अंतर्गत ही इंटरनेट बंदी के आदेश जारी करना जारी रखा है, जिससे 2024 में लागू किए गए अधिक सशक्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की उपेक्षा होने की आशंका उत्पन्न होती है।
- सुरक्षा उपायों के बावजूद, सूचना का अधिकार (RTI) के अंतर्गत प्राप्त निष्कर्षों तथा विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि अनेक राज्य अब भी इंटरनेट बंदी के आदेशों और समीक्षा अभिलेखों को सार्वजनिक नहीं करते। इससे पारदर्शिता, न्यायिक पर्यवेक्षण तथा अनुराधा भसीन मामले और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है।
- उदाहरण के लिए, 2025 में उत्तर प्रदेश (बरेली) तथा मणिपुर में इंटरनेट निलंबन के आदेश पुराने कानूनी ढाँचे के अंतर्गत जारी किए गए थे।
- यह भी चिंता व्यक्त की गई है कि कुछ मामलों में स्थानीय पुलिस स्पष्ट वैधानिक आधार के अभाव में आपराधिक कानूनों के तहत नेटवर्क जाम (Network Jamming) की कार्रवाई करती है।
उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियाँ
- अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट तक पहुँच का अधिकार, अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है।
- न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट शटडाउन कानून द्वारा अधिकृत, वैध उद्देश्य पर आधारित, आवश्यकता और आनुपातिकता की कसौटी पर खरी, सबसे कम प्रतिबंधात्मक उपाय, तथा क्षेत्र और अवधि की दृष्टि से सीमित होनी चाहिए।
- न्यायालय ने अनिश्चितकालीन इंटरनेट शटडाउन को असंवैधानिक घोषित किया तथा निर्देश दिया कि इंटरनेट शटडाउन के आदेश सार्वजनिक किए जाएँ और पाँच कार्य दिवसों के भीतर बहु-सदस्यीय समीक्षा समिति द्वारा उनकी समीक्षा की जाए।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट सेवाओं का पूर्ण निलंबन अंतिम उपाय (Last Resort) होना चाहिए तथा उससे पहले कम हस्तक्षेपकारी उपायों पर विचार किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
- इंटरनेट तक पहुँच आज मौलिक अधिकारों, आर्थिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तथा लोकतांत्रिक भागीदारी का एक महत्त्वपूर्ण आधार बन चुकी है।
- लोक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा में राज्य की वैध भूमिका है, किंतु इंटरनेट बंदी को केवल असाधारण परिस्थितियों में अपनाया जाने वाला उपाय ही बने रहना चाहिए।
- किसी भी इंटरनेट निलंबन को अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) के निर्णय के अनुरूप तथा वैधता, आवश्यकता, आनुपातिकता, पारदर्शिता और न्यायिक पुनरावलोकन के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।
स्रोत: TH